महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास Mahakaleshwar Temple in Hindi

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग / Mahakaleshwar Jyotirlinga 
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत में मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। यह महादेव जी के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग प्राचीन हिन्दु मन्दिर है। महाकालेश्वर रूद्र सागर सरोवर के किनारे पर स्थापित है। यह अद्भुत मन्दिर महादेव की अपार गुप्त शक्तियों छिपी हुई हैं। जिसे महाकाल भी कहा जाता है। शास्त्रों अनुसार महाकालेश्वर में भगवान शिव स्वयं बसते हैं। शक्ति पीठ के रूप में महाकालेश्वर को 18 महा शक्ति पीठ भी कहा जाता है। सावन में महाकालेश्वर दर्शन, पूजा अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योंतिर्लिंग में पूरे साल ही श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। लेकिन सावन महीनें में इस मंदिर का खास महत्व है। 
हिंदू पौराणिक मान्यताओं अनुसार के सच्चे मन से निस्वार्थभाव से उज्जैन महाकालेश्वर दर्शन करने पर अदृश्य शक्ति पाप कर्मों का नाश कर मनुष्य को मृत्यु और पर्नजन्म के चक्र से मुक्ति कर मोक्ष की ओर ले जाती हैं। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को महाकाल रूप भी कहा जाता है। 
कहा जाता है कि

आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। 
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।

अर्थात आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही सर्वमान्य स्र्वोच्च महाकालेश्वर ज्योंतिर्लिंग है। 

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महाकालेश्वर मन्दिर इतिहास 
महाकालेश्वर मन्दिर का कई बार जींर्णोंद्धार किया गया है। श्रीमान पेशवा बाजी राव, छत्रपति शाहू महाराज, रानाजिराव शिंदे महाराजा, नाथ महादजी शिंदे महाराज, महारानी बायजाबाई राजे शिंदे, जयाजिराव साहेब शिंदे और आलीजाह बहादुर ने मन्दिर सुरक्षा रखरखाव में कई बदलाव और मरम्मत करवायी थी। यहां पर ओमकारेश्वर महादेव की मूर्ति को तीर्थस्थल के ऊपर पवित्र स्थान बना है। साथ में गणेश जी, माता पार्वती और स्वामी कार्तिकेय की मूर्तियों को पश्चिम, उत्तर और पूर्व दिशा में स्थापित हैं। और दक्षिण दिशा की और महादेव जी के वाहन नंदी की मूर्ति स्थापित है।
नागपंचमी के दिन यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। नागचंद्रेश्वर के मंदिर को साल में सिर्फ नागपंचमी को ही एक दिन के लिए खोला जाता है। यह बहुत ही अद्भुत दृश्य होता है।

महा शिवरात्रि को यहां विशाल महोत्सव का आयोजन होता है। श्रद्धालु देर रात तक भगवान शिव की पूजा, अर्चना, अराधना, मंत्रजाप करते हैं। महाकालेश्वर महाकाल दर्शन के लिए विश्वभर से लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं। महाकालेश्वर का मंदिर का शिखर बहुत ऊंचा है। मन्दिर की शिखर आकाश में जाती हुई महसूस होती है। 
मंदिर 5 मंजिला बनी है, जिनमे से एक मंजिल जमीन के नीचे की ओर बनी है। मंदिर में पवित्र गार्डन में बना है। साथ ही सरोवर विशाल दीवारों से घिरा है। और पवित्र स्थानों पर पीतल के लैंप भी लगाये गए है। यहां शानदान कलाकृति मन्दिर को और भी ज्यादा भव्य बनाती है।
महाकालेश्वर मंदिर साथ ही श्री स्वपनेश्वर महादेव मंदिर भी स्थापति है। जहाँ पर भक्त महाकाल के रूप में महादेव की आराधना करते है, और कुशहाल और समृद्धि की मनोकामना करते है। महाकालेश्वर कपाट सुबह 4 से रात 11 बजे तक खुले रहते हैं। जहाँ हर सुबह जगह -जगह पर हर हर महादेव के जयकारे सुनाई पड़ते हैं।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग कथा
पहली कथा
शिव पुराण अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु पृथवी रचना को लेकर बहस करने लगे थे। दोनों की  परीक्षा लेने के लिये महादेव जी ने पिल्लर रूप में ज्योतिर्लिंग को ती भाग में बांटा। भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने ज्योतिर्लिंग के निचे और तरफ से ऊपर की तरफ से अपने रास्तो की बांटा लिया ताकि  प्रकाश के अंत छोर को जान सके। ब्रह्मा जी ने त्रिकाल महादेव झूट बोला की उन्हें प्रकार अंत मिल गया, जबकि भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी।
ब्रह्मा जी के झूठ से क्रोधित होकर भगवान शिव दुसरे पिल्लर में से प्रकट हुए और ब्रह्मा जी को अभिशाप दिया की दैवीय पूजा अर्चना में ब्रह्मा को भगवान विष्णु से अधिक स्थान नहीं मिलेगा। भक्त लोग ब्रह्मा से ज्यादा विष्णु की पूजा अर्चना करेगें। तब से यहां पर ज्योतिर्लिंग स्थापित है। 

दूसरी कथा
शिवपुराण की एक अन्य कथा अनुसार अवन्ति नगर में वेद कर्मरत वेदप्रिय ब्राह्मण रहता थे। जोकि भगवान शिव के अनन्त भक्त थे। कर्मरत ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र और वैदिक कर्मों का अनुष्ठान करते रहते थे। वेदप्रिय ब्राह्मण के चार पुत्र प्रियमेधा, देवप्रिय, संस्कृत एवं सुवृत थे। सभी पुत्र माता पिता अनुसार तेजस्वी और सद्गुणों से परिपूर्ण थे।
आस में रत्नमाल नामक पर्वत पर दूषण दुष्ट राक्षस रहता था। दूषण राक्षस को अजेय बरदान था। वह वेद कर्मरत ब्राह्मणों की पूजा पाठ अनुष्ठान में विघ्न डालता था। जिससे वेद कर्मरत वेदप्रिय ब्राह्मण अति दुःखी होते थे। एक बार अवन्ति नगर पर राक्षस दूषण ने विशालकाय राक्षस सेना सहित आक्रमण कर दी। जिससे अवन्ति नगर में त्राहि त्राहि मच गई। इस पर वेदप्रिय ब्राह्मण पुत्रों ने सभी नगर वासियों को भरोसा दिलाया कि भगवान शिव हमारी रक्षा करेगें। सभी वेदप्रिय ब्राह्मण पुत्र और नगर वासी आसन लगाकर आंखें बन्द कर भगवान शिव की अराधना करने लगे। कुछ देर बाद दूषण सेना सहित शिव अराधना में मग्न ब्राह्मणों को मारने के आया। जैसे ही राक्षस ने तलवार उठाई उसी समय भगवान शिव पार्थिव लिंग के अन्दर से विशाल रूप में प्रकट हुई। भगवान शिव ने अमर अजेय दूषण राक्षस को कहा मि मैं महाकाल हूं, भगवान शिव ने क्षण भर में सारी राक्षस सेना को भष्म हो गई। तब से उस स्थान पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग बना है।

तीसरी कथा
राजा चंद्रसेन और बालक की कथा
कालान्तर में उज्जयिनी नगरी राजा जितेन्द्रय चन्द्रसेन शासन करते थे। राजा जितेन्द्रय चन्द्रसेन बहुत ज्ञानी, सदाचारी और भगवान शिव के अन्नत भक्त थे। राजा के मंत्रीगणों में से मणिभद्र राजा के अच्छे दोस्त भी थे। मणिभद्र के पास एक अमूल्य रहस्यमयी चिन्तामणि थी, उन्होंने वह मणि राजा को मित्रता के रूप में भेंटकर दी। राजा जितेन्द्रय चन्द्रसेन के गले में अमूल्य चिन्तामणि देखकर अन्य आसपास के राजाओं में चिन्तामणि को लेकर लोभी बन जाते थे। सभी शत्रु राजाओं ने चतुरंगिणी विशाल सेना बनाकर उज्जयिनी नगरी पर आक्रमण कर दिया। लाखों अक्षण सेना से घिरने पर  राजा जितेन्द्रय चन्द्रसेन ने महाकाल भगवान शिव की अराधना करने लगे। 
उज्जयिनी नगरी में एक विधवा ग्वालिन अपने शिवभक्त पुत्र के साथ रहती थी। ग्वालिन की शिवभक्त इतनी अधिक थी कि वे भक्त में लीन हो जाते थे। एक बार मां ग्वालिन ने गुस्से में आकर बालक की पूजा छिन्न-भिन्न कर दी। बालक हाय शिव शिव शिव बालकर जमीन पर गिर पड़ा। कुछ समय पश्चात आंख खुली तो पूजा वाली जगह पर विशाल शिव मन्दिर देखा। इस पर ग्वालिन तुरन्त राजा जितेन्द्रय चन्द्रसेन के पास गई और पूरा वृतान्त सुनाया। यह घटना दुश्मन राज्यों के गुप्तचरों ने सुन लिया। और वापस जाकर गुप्त सूचना दी। फिर सभी दुश्मन राजा भयभीत हो गये। जिस राज्य में स्वंय भगवान शिव विराजमान हैं, उस राज्य का हम क्या कोई भी कुछ नहीं विगाड़ सकता। सभी राजाओं ने उज्जयिनी राज जितेन्द्रय चन्द्रसेन से मित्रता कर ली। अपनी भूल के लिए क्षमायाचना की। ग्वालिन बालक की भक्ति से बने शिवलिंग के दर्शन किये।राजा चंद्रसेन के पास जो रहस्यमयी चिन्तामणि थी, कहा जाता था कि वह भी शिव के पुष्प का एक अंश था। राजा चंद्रसेन को अपनी भूल का अहसास हुआ। और उन्होंने आलोकिक चिन्तामणि को मन्दिर में लिंग पर समर्पित कर दी थी। माना जाता है कि भगवान शिव स्वयं महाकालेश्वर में बसे थे। यहां आज भी भगवान शिव स्वयं भक्तों की रक्षा हेतु विराजमान हैं।

उज्जैन मेला
उज्जैन का प्रसिद्ध सिंहस्थ मेला श्रद्धालुओं के लिए बहुत ही दुर्लभ संयोग होता है। इस दिन यहाँ दस दुर्लभ योग एक साथ होते हैं, जैसेकि: वैशाख माह, मेष राशि पर सूर्य, सिंह पर बृहस्पति, स्वाति नक्षत्र, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा आदि हैं।
प्रति बारह वर्ष में पड़ने वाला कुंभ मेला उज्जैन का सबसे विशाल मेला होता है। उज्जैन कुम्भ मेला में देश-विदेश से साधु-संतों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है। यह हरिद्धार कुम्भ मेले की तरह होता है। पुराण ग्रन्थों अनुसार जब समुद्र मंथन के पश्चात देवता अमृत कलश को दानवों से बचाने के लिए वहाँ से पलायन कर रहे थे, तब उनके हाथों में पकड़े अमृत कलश से अमृत की बूँद धरती पर जहाँ भी गिरी थी, उस स्थान पवित्र तीर्थ बन गया। उन्हीं स्थानों में से एक पवित्र उज्जैन सिंहस्थ है। जहां प्रति बारह वर्ष में सिंहस्थ मेला आयोजित होता है। 

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन की सुविधाएं 
भस्म आरती और शिवलिंग जलाभिषेक
भस्म आरती और शिवलिंग जलाभिषेक में शामिल होने के लिए पहले से आॅन लाईन या आॅफ लाईन बुकिंग करवानी पड़ती हैं। इस विशेष पूजा अराधना में अधिक लोगों को परमिशन नहीं मिलती है। इस विधि विधान में शामिल होने के लिए रात्रि 1 बजे से ही लाईनों पर लगना होता है। जो लोग भस्म आरती और शिवलिंग जलाभिषेक में शामिल होते हैं उनके लिए खास ड्रेस कोड़ होता है। महिलाएं साड़ी में और पुरूष धोती अनिवार्य पोशाक होती है। यह खास पोशाक मन्दिर के बाहर किराये पर भी मिल जाते हैं।

श्रद्धालुओं की ठहरने की व्यवस्था
महाकालेश्वर उज्जैन नजदीकी काफी होटल, विश्रामगृह, धर्मशालाएं आदि तरह से ठहरने की व्यवस्था है। यहां पर हजारों यात्रियों के लिए ठहरने की व्यवस्था है।

वायुमार्ग
महाकालेश्वर उज्जैन जाने के लिए अलग अलग राज्यों से मध्यप्रदेश जाने की व्यवस्था है। परन्तु आप उज्जैन नजदीक इंदौर तक ही हवाई मार्ग से जा सकते हैं। इंदौर से महाकालेश्वर उज्जैन लगभग 60 किमी. दूरी पर है। इंदौर एसरपोर्ट से महाकालेश्वर उज्जैन आने जाने लिए  बस, टैक्सी सेवाएं उपलब्ध होती हैं।

रेलमार्ग
उज्जैन पहुंचने के लिए दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता और अन्य राज्यों से भी सीधे ट्रेनें जाती हैं। सावन और खास महोत्सव पर उज्जैन के लिए विशेष रेल सेवाएं उपलब्ध होती हैं।

सड़कमार्ग
महाकालेश्वर उज्जैन दर्शन के लिए विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु बुकिंग पर बस सेवाएं लगवाते हैं। उज्जैन चारों दिशाओं से 48 से 52 नैशनल हाइवे से जुड़ा हुआ है। महाकालेश्वर उज्जैन आने जाने के लिए सड़को का जाल बिछा है। इसलिए श्रद्धालु को आने जाने में कोई दिक्कत नहीं होती है।


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